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इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का गिरता स्तर

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कुछ दिन पहले मैंने एक कहानी पढ़ी थी ‘रस्सी का साँप ‘जिसमे एक दरोगा जी अपने नाई के मजाक पर उसको अपराधी सिद्ध कर देते हैं और बाद में निर्दोष घोषित कर आर्थिक लाभ दिलवाते हैं।कुछ ऐसी ही दशा भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की होती जा रही है।भारत में न्यूज़ चैनल रोज रस्सी का सांप बनाते हैं। किसी को नायक बना देते हैं और किसी को खलनायक ।मीडिया रिपोर्टर एक साधारण सी घटना को देशव्यापी आंदोलन बना सकते हैं। नेताओं के चरित्र प्रमाण पत्र जारी करने के एक मात्र अधिकृत केंद्र भी यही हैं।देश भर में दुनियां भर की बहुराष्ट्रीय कंपनी के उत्पादों को प्रमोट करने की जिम्मेदारी भी इनकी ही है। एक आतंकवादी को भी ये भोलाभाला मासूम सिद्ध करने की क्षमता भारत की मीडिया में है इसीलिए भारत में सभी राजनैतिक पार्टियां करोड़ो रुपये खर्च कर मीडिया प्रबंधन कर रही हैं।
भारत के एक बहुत ही पॉपुलर न्यूज़ चैनल आजतक के रिपोर्टर एक बच्चे का इस्तेमाल करके एक सनसनीखेज न्यूज़ का निर्माण करते दिखाई देते हैं हालाँकि न्यूज़ निर्माण की प्रक्रिया का वीडियो बायरल होने पर आजतक चैनल ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि दिखाया गया व्यक्ति उनका रिपोर्टर ही नहीं है।ऐसी ही एक खबर कुछ दिन पहले और आई थी जिसमे एक पत्रकार की फेसबुक से पिक्चर चोरी कर उसे सोशल मीडिया के न्यूज़ब्लॉग ने एक सनसनीखेज न्यूज़ दिखाने में इस्तेमाल किया और बाद में एक न्यूज़चैनल ने उसे वैसा ही दिखा दिया रिपोर्टर की धमकी के बाद उसकी फोटो हटा दी गयी। ये दो घटनाएं ये बताने के लिए काफी हैं कि भारत में न्यूज़चैनल कितनी घटिया स्तर की ख़बरें दिखाने को तत्पर हो रहे हैं। न्यूज़ चैनल की रिपोर्टिंग हमेशा से ही विवादास्पद रहीं हैं। भारत में चलने बाले कई न्यूज़ चैनल या तो विदेशी हैं या विदेशी फंडिंग पर संचालित हैं ऐसे में इन चैनल से देशहित की कल्पना करना मूर्खता ही होगी।
कुछ वर्ष पूर्व मुझे हंस पत्रिका का एक बहुत पुराना विशेषांक पढ़ने को मिला जो पूरी तरह पत्रकारिता पर ही था और उसमे कई लेखों में इस बात का खुलकर उल्लेख किया गया था कि किसी समाचार चैनल में कोई व्यक्ति कैसे प्रवेश कर एक साधारण कर्मचारी से न्यूज़रूम एडिटर तक का सफ़र तय करता है और इस दौरान उसे कौन कौन से हथकंडे अपनाने पढ़ते हैं, किस तरह सुंदरता का इस्तेमाल न्यूज़रूम में पहुँचने के लिए किया जाता है, किस तरह खबर चलाने और रोकने के लिए सौदेबाजी की जाती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पत्रिका के लगभग सभी लेख समाचार चैनल के ही लोगों द्वारा लिखे गए थे।
अब अगर हम हंस पत्रिका के उपरोक्त तथ्यों को सच मानते हैं तो हमें घटिया पत्रकारिता से जुड़े बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर आसानी से मिलते दिखाई पड़ते हैं। कि किस प्रकार आप पार्टी की विधायक साजिया इल्मी जो कि एक पत्रकार थी कुछ ही वर्षों में कई सौ करोड़ की प्रॉपर्टी की मालकिन बन गयीं और 10 वर्ष पहले मीडिया में आये दीपक चौरसिया एक न्यूज़ चैनल के मालिक बन गए।सोशल मीडिया पर लोग प्रश्न पूँछ रहे है कि आखिर एक न्यूज़चैनल बाले न्यूज़ रूम के रिपोर्टर को कितने रूपये का भुगतान देती है अगर भुगतान एक लाख रुपया महीना भी है तो भी 10 साल में कोई पत्रकार करोड़ों नहीं कमा सकता तो फिर इन न्यूज़ एडिटर के कई करोड़ के बंगले कैसे खड़े हो गए। क्या इन पर आय से अधिक संपत्ति का केस नहीं बनता?और अगर बनता है तो आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जो कोई भी इन पर हाँथ नहीं डालता है
भारत में अब पत्रकारिता विश्वसनीय नहीं रह गयी है। देश के लोकतंत्र के सबसे मजबूत स्तम्भ का इस्तेमाल राजनैतिक पार्टियां खुले आम कर रही हैं।पहले भ्रष्टाचार में अफसर नेता गठजोड़ प्रसिद्ध था पर नए परिदृश्य में अफसर नेता और मीडिया गठजोड़ फेमस हो रहा है।मीडिया का इस्तेमाल अब राजनेता अपने विरोधियों को बर्बाद करने में कर रहे हैं। जिस मीडिया ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआई की थी वही मीडिया अब विदेशी हाँथो की कठपुतली बन उनके इशारे पर नाच रही है।बहुत छोटे शहरों में एक ही व्यक्ति 8 से 10 न्यूज़ चैनल की रिपोर्टिंग अकेले ही कर लेता है एक बाईट के बदले उसको कुछ सौ से कई हज़ार रुपये की आमदनी हो जाती है पर यह तब संभव है जब यह बाइट चल जाए और बाइट चलने के लिए उसे सनसनी बनाना जरुरी होता है।इसी सनसनी के कारण मीडिया रिपोर्टर कुछ भी करने को और किसी भी हद तक गिरने को आमादा हो जाते हैं।
ये भी एक सच है कि जिस शहर में जिस बड़े मीडिया रिपोर्टर को जो पार्टी हैंडल कर लेती है उसके विरोध में कोई भी खबर कभी नहीं चलती चाहे वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यूँ ना हो। एक छोटे से न्यूज़ रिपोर्टर के यहाँ मंत्री जी तक बैठते हैं और ये रिपोर्टर किसी भी कद्दावर राजनेता के घरेलू मित्र बन जाते हैं हालात यहाँ तक है कि मीडिया रिपोर्टर किसी बारदात की खबर न्यूज़ रूम तक पहुचाने से पहले स्थानीय नेता और प्रशासन के अधिकारियों तक पहुंचाते है यदि कही बात बन जाती है तो न्यूज़ रुक जाती है नहीं तो चल जाती है और यही रुकने चलने के चक्कर में पैसा बरसता रहता है।साथ ही यही रिपोर्टर नेता जी और व्यापारी के लिए माध्यम भी बनते हैं।
ताज्जुब है कि सीमा पर शहीद जवान को न्यूज़ में केवल कुछ मिनट मिलते है और आतंकवादी को कई दिन। गंभीर विषय नीचे चलने बाली पट्टी पर सिमट जाते है और आशाराम बापू जैसे लोग हफ़्तों तक छाए रहते हैं।देश में गरीबी अशिक्षा स्वास्थ्य जैसे मुद्दे मीडिया से गायब हैं और राजनेताओं के उठने बैठने बोलने हँसने मुस्कराने जैसी न्यूज़ रोज की बात है। देश में बदलाव के लिए क्रन्तिकारी प्रयास करने बाले लोगो को न्यूज़ में जगह नहीं मिलती और फ़िल्मी कलाकारों की हरकतों पर घंटो की कवरेज मिल रही है।ये मीडिया का ही कमाल है कि मैग्गी घरों से गायब हो गयी।पारवारिक नाटकों के लिए भी न्यूज़ चैनल विशेष कवरेज दिखाते हैं और अल्पसंख्यक,मुसलमान और शेड्यूल कास्ट से सम्बंधित समाचार इनकी लिस्ट में सर्वोच्च प्राथमिकता पर रहते हैं क्योंकि इन समाचारों से देश की राजनीति में आसानी से आग लगाई जा सकती है और यह आग लगाने के लिए राजनैतिक पार्टियां प्रतिवर्ष कई करोड़ का करार इन न्यूज़चैनल के साथ करती हैं।
कुछ न्यूज़ चैनल आजकल देशहित से जुड़े मुद्दे संजीदगी से उठा रहे हैं जिनमे ज़ी न्यूज़ का नाम लिया जा सकता है पर यहाँ भी उनके मालिक सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत रुझान ही इसके लिए जिम्मेदार है।ताज्जुब इस बात का भी है कि विभिन्न राजनैतिक विचारधारा से जुड़े व्यक्ति अपनी पार्टी के नेताओं और पार्टी की विचारधारा की तारीफ करने बाले चैनल को देखना पसंद करते हैं इसलिए प्रत्येक चैनल के पास पर्याप्त दर्शक उपलब्ध बने रहते हैं।हालाँकि सभी न्यूज़रिपोर्टर भ्रष्ट हो ऐसा नहीं है, पर अगर न्यूज़ रिपोर्टर वास्तब में सही देशहित से जुडी खबरें दिखाता है तो वह मालिक के निशाने पर आ जाता है और उसकी छुट्टी हो जाती है ऐसे में रिपोर्टर को वही न्यूज़ दिखानी पड़ती है जो उसके मालिक की मर्ज़ी के अनुकूल हो। अब न्यूज़ चैनल का मालिक किस बिज़नस में है और किस कॉर्पोरेट घराने से जुड़ा है और किस राजनैतिक पार्टी से फीडबैक ले रहा है यह पता करना सबके बस की बात नहीं है।
हालाँकि ये लेख मीडिया को पसंद नहीं आएगा पर इस छुपी सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। सच हमेशा दोस्तों के मुँह से ही बाहर आता है और मीडिया रिपोर्टर भी समाज से जुड़े व्यक्ति ही है अतः उनके क्रियकलाप ,समाज में और दोस्तों में गोपनीय नहीं हैं।
हालाँकि प्रिंट मीडिया अभी भी कुछ हद तक लोगो में अपना विश्वास बनाये हुए है पर अपना कार्यक्षेत्र बड़ाने के लिए नए नियुक्त पत्रकारों का वेतन जुटाने के चक्कर में समाचार पत्र भी अब प्रोडक्ट प्रचार पत्र बनते जा रहे है जहाँ खबर से ज्यादा विज्ञापन होते हैं और कम वेतन के से परेशान समाचार पत्र के पत्रकार अब स्थानीय प्रशासन के ब्लैकमेलर बनते जा रहे हैं ।फिर भी इनकी विश्वसनीयता पर अभी भी प्रश्न नहीं लगे हैं।
अवनीन्द्र सिंह जादौन
महामंत्री टीचर्स क्लब
उत्तर प्रदेश



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